Thursday, March 20, 2014

इस हॅसी में ना जाने क्या कुछ ख़ास है


इस हॅसी में ना जाने क्या कुछ ख़ास है
बस चमकति रहती है
चाहता हूँ देखता रहूँ चुपचाप
और पूरी होती रहे दिल में जो हर आस है

समझता हूँ, पर शायद समझना नहीं चाहता 
अनजान बन, सुनहरी यादों को बटोरने में लगा हूँ
बिना  ये पूछे कि तुम क्या चाहती हो 
जानता हूँ, आदत है बुरी पर, मैं बदलना नहीं चाहता 

तुम को बाँहों में ले, समय को थामे बैठा हूँ
कहीं छूट ना जाए एक पल,  रह न जाए कोई बात
यहीं सोच कर मतलबी दुनिया में 
एक मतलबी मैं  भी बना बैठा हूँ