Wednesday, February 26, 2014

अब मै सिर्फ एक वृक्ष हूँ सुखा हुआ


मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
कभी मुझ पर पंछियो का बसेरा था
सुबह शाम के चहचहाट में खुशियाँ थीं
मुझे छोड़ शहर का हर कोना सुना था

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
बरसों पहले आस  भी छूटा
उड़ चुके हैं अब सारे पंछी , घोंसला पूरा खली है
ना जाने क्यों याद नहीं, आंतिम पत्ते से कब रिश्ता टूटा

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
बीते काल ने धीरे धीरे सब हरा
घोंसले का एक एक सुखा तिनका
और जो भी बाकि मुझमें  था हरा

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
थी बसन्त पर मैं था सुखा
प्यार दिखा  अपनों ने ही मुझे तोड़ तोड़
मुझसे अपने घर का चूल्हा फूंका

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
मत काटो आज , जड़ों में अभी  प्राण बाकी है
देख कुल्हाड़ी जब मैंने  कहा
तभी आवाज आई  कट दो, अब देने को इस के पास क्या बाकी है

मै एक वृक्ष था सुखा हुआ
किस से कहता , मैं इंसान था, पेड़ मुझे बनाया गया
जब कटा मरा मैं था
पर मुझे चिता बना किसी और को जलाया गया



 

Monday, February 17, 2014

आइना


चाँद ने पेड़  की ओट से
मुझे खिड़की पर खड़ा देखा
और कहने लगा
सर्द अकेली रातों में, खुले पट में
क्या ढूँढ़ते हो

मैंने कहा, चाँद से
वो समय  बीत गया जब
आईने में खुद को देखता था
 अब तो अपना चेहरा भी याद नहीं
बस खिड़की को आइना समझ कर खुद को ढूंढता हूँ

ये सुन  चाँद ने खुद को
बादलों के पीछे किया
और मुझ से हँस  के कहने लगा
देखा है मैंने तुम को उस समय और आज भी
बात सिर्फ इतनी  सी  है, कहो तो मैं बताऊँ 

मैं ने कहा  अब कह भी दो , बरसों बीते बातों बिना
यह सुन चाँद और ज्यादा चमकने लगा
रूकती सासों में हसता हसता कहने लगा
तुम वहीं हो आइना  वहीं है ,बस  उम्र और रिश्तों ने नजरिया बदल दिया
अब आइना खिड़की है बस इस लिए कुछ दीखता नहीं है