Tuesday, August 13, 2013


सखी रे कुछ मत कहना सुन मेरी बात
मै कल सो न सकी जागती रही सारी रात
वचनों और फ़ेरों में बांध  के
जिसको दिया मेरा हाथ
रहना  है संग उसके पर मन देता नहीं साथ


सखी रे कुछ मत कहना सुन मेरी बात
अभी भी महसूस होती  है मुझे
उन हाथों की नरमी , बाँहों का घेरा और सासों की गर्मी
चाहती हूँ जीना संग उसके पर कोई देता नहीं साथ


सखी रे कुछ मत कहना सुन मेरी बात
थिरकता था दिल मेरा सुन जिस का नाम
होती थी बेचैन मिलने जिस से मै सुबह शाम 
चाहती हूँ चल पडूं मै  ऊस की ओर , पर कदम देते नहीं साथ


सखी रे कुछ मत कहना सुन मेरी बात
कहते है सब प्यार वो करेगा , नखरे तेरे सहेगा
मुस्कुराहट जाए की मुरझा और के बाँहों में
खामोश होगी खिलखिलाहट और की आँगन में
चाहती हूँ बता दूँ , पर लब्ज देते नहीं साथ


सखी रे कुछ मत कहना सुन मेरी बात
है जो मेरे दीवाना, मिले तो जरूर बताना
जहाँ भी रहे मन मेरा साथ रहेगा
आशाओं को समेटे , उम्मीदों को सँजोए
अगले जनम में इंतज़ार उस का रहेगा
चाहती हूँ अभी रोक दूँ , पीछे समय को मोड़ दूँ
इन्सान हूँ किस्मत और  वक्त हमेशा देते नहीं साथ