Thursday, August 11, 2011

बढ़ प्रेम जब माला बना

बढ़ प्रेम जब माला बना..
चढ़ा हरी को भेंट
टूट जब बिखरा भक्तों में..
ह्रदय से सबने लगाया लपेट....

बढ़ प्रेम जब माला बना..
बंधा इन्द्र के हाथ..
कवच इन्द्राणी का जीत गया
दे असुरों को मात.

बढ़ प्रेम जब माला बना..
बनी नई रिश्तों की बात.
सात जन्मों का बंधन में ..
बने सुनहरे दिन, हुई चांदनी रात..

बढ़ प्रेम जब माला बना..
चमक उठी तेज तलवार
कर्णावती की रक्षा करने
पहुंचा हुमायूँ पास.

बढ़ प्रेम जब माला बना..
बंधा बाली बलवान...
लक्ष्मी ने वर वापस लिया..
लौटे विष्णु वैकुण्ठधाम

बढ़ प्रेम जब माला बना..
चढ़ा पृथक शरीर
नया जीवन आरम्भ हुआ.
पावन गंगा के तीर

Monday, August 1, 2011

दीप जले

दीप जले

सूरज की जब पहली किरणे
आ टकराए चौखट से ..
घर मंदिर के तब फाट खुले
और घर आँगन में दीप जले

खुली फाट की ओट में बाला
खड़ी दर्पण संग बतियाए
चमकती कानों की बाली और ऊपर ओठों की लाली
देख दर्पण का मन ललचाये
और मन दर्पण में दीप जले

बढे कदम मिलने को, जा पहुंचे वट तीर
गुजरता समय पूछे बाला कहाँ है तेरा  प्रीत
शरमाई पवन, जब दो होंठ मिले
वट पत्तों में तब दीप जले

आया जीवन वसंत का मौसम
चेहरों पे मुस्कान खिली.
बजे ढोल सहनाई बजे
घर आँगन में दीप जले

उठी डोली बदला जग संसार
छोड़ आई बचपन सौ समंदर पार
लौटा बचपन फूल पीतल बजे
धरती अम्बर पे दीप जले

जीवन का कहीं अंकुर फूटा
कहीं जीवन की शाम हुई
श्वेत आवरण में लिपटा जीवन
कोई आवाज कहीं शांत हुई
तब मीठे पकवान बने
और घर आँगन में दीप जले