Friday, July 25, 2008

फीलिंग 1

जींदगी के अनजाने रास्तों पर यूहीं चलते चले गए
चलते चलते पहुंचे वहां , जहाँ से सब चले गए ...
न जाने जींदगी इतनी नाराज़ क्यों है
जीन रीश्तों का साथ था वो भी टूटते चले गए ....



जींदगी के अनजाने रास्तों पर यूहीं चलते चले गए
बरसों गुजर चुके हैं , उन रीश्तों को टूटे ..
हलकी सी परछाई बाकी है
पर ख्वाबों में ही सही , हम अकेले होते चले गए ...



जींदगी के अनजाने रास्तों पर यूहीं चलते चले गए
आज भी रात को दो बूंद तस्सल्ली दे गयी ...
आखों से निकले साथ थे , पर कल फीर आएंगे कह , वो भी चले गए ...
यूँ ही बरसों गुजर ते चले गए..


जींदगी के अनजाने रास्तों पर यूहीं चलते चले गए
जीवन का अंतीम चरण है, आजाओ जरुरत है तुम्हारी
दे दो साहारा अपनी बाहों का , चूम लेने दो मुझे, आ जाओ ...
ये न कहना ,तुम हम तक पहुँचते , इस से पहले हम चले गए ....

जींदगी के अनजाने रास्तों पर यूहीं चलते चले
गए चलते चलते पहुंचे वहां , जहाँ से सब चले गए ...

3 comments:

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

वर्ड वेरिपिकेशन हटा लें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी. बस एक निवेदन है.

शैलेश भारतवासी said...

हिन्दी ब्लॉग परिवार में आपका स्वागत है। हम आपसे नियमित ब्लॉग लेखन की अपेक्षा करते हैं।

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Batangad said...

अहसास अच्छे से उभर रहे हैं।