ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है
अपने ने गम में डूबा हुआ
उस को छुपता सा दीखता है ...
ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है ...
अज उसकी चांदनी
न जाने क्यों उससे दूर है ...
जीस का उस को साथ था .
वहीँ आज पराया सा दीखता है....
ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है
आज घने -काले बादलों की ओट से
एक चेहरा झांकता सा दीखता है......
न जाने कीस शर्म के मारे
वो ख़ुद को छुपता सा दीखता है...
ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है
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Wednesday, July 25, 2007
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