ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है
अपने ने गम में डूबा हुआ
उस को छुपता सा दीखता है ...
ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है ...
अज उसकी चांदनी
न जाने क्यों उससे दूर है ...
जीस का उस को साथ था .
वहीँ आज पराया सा दीखता है....
ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है
आज घने -काले बादलों की ओट से
एक चेहरा झांकता सा दीखता है......
न जाने कीस शर्म के मारे
वो ख़ुद को छुपता सा दीखता है...
ना जाने क्यों चाँद मुझे
धुंधला धुंधला सा दीखता है
--
Wednesday, July 25, 2007
Tuesday, July 24, 2007
फीलिंग 2
कल कुछ देर हवा चली
और खनके पीपल के पत्ते
अम्बर से कुछ बूंद गीरी...
और मैं भी उस में भीग गया
कल जब उस भीगे मौसम में
जब उस भीगे यौवन को देखा ...
तन तो मेरा भीगा था
मन भी मेरा भीग गया .....
कल कुछ देर हवा चली और खनके पीपल के पत्ते
तभी एक बूंद कानों से गुजरी
गिरती गिरती बोल गई ...
मील न सके उस से तो क्या
आ बह चल मेरे साथ तू
जो बूंद गीरी उस यौवन से
उस से मील तो जाएगा
कल कुछ देर हवा चली
और खनके पीपल के पत्ते
अम्बर से कुछ बूंद गीरी...
और मैं भी उस में भीग गया
--
और खनके पीपल के पत्ते
अम्बर से कुछ बूंद गीरी...
और मैं भी उस में भीग गया
कल जब उस भीगे मौसम में
जब उस भीगे यौवन को देखा ...
तन तो मेरा भीगा था
मन भी मेरा भीग गया .....
कल कुछ देर हवा चली और खनके पीपल के पत्ते
तभी एक बूंद कानों से गुजरी
गिरती गिरती बोल गई ...
मील न सके उस से तो क्या
आ बह चल मेरे साथ तू
जो बूंद गीरी उस यौवन से
उस से मील तो जाएगा
कल कुछ देर हवा चली
और खनके पीपल के पत्ते
अम्बर से कुछ बूंद गीरी...
और मैं भी उस में भीग गया
--
Monday, July 23, 2007
कहीं दूर सूरज को देख के
कहीं दूर सूरज को देख के
डरता हूँ डूब जाऊँ मैं भी कहीं ....
उस का तो अपना सवेरा है
मेरा तो जग में कोई नहीं...
अज खड़ा उसी जगह पे
थोड़ा गम थोड़ा मुस्कान लिए...
यहीं सोचता रहता हूँ
दुनिया में क्या मैं आया हूँ
अपना अस्तीत्व खोने के लिए...
कहीं दूर सूरज को देख के
डरता हूँ डूब जाऊँ मैं भी कहीं ....
वहीँ रास्ता वहीँ मंजील
और फिर अन्धकार वहीँ.
उस की तो है जींदगी वहीँ ..
मुझे वहीँ छोड़ वो आए गा
मैं रह जाऊंगा वहीँ खड़ा ....
कहीं दूर सूरज को देख के
डरता हूँ डूब जाऊँ मैं भी कहीं ....
डरता हूँ डूब जाऊँ मैं भी कहीं ....
उस का तो अपना सवेरा है
मेरा तो जग में कोई नहीं...
अज खड़ा उसी जगह पे
थोड़ा गम थोड़ा मुस्कान लिए...
यहीं सोचता रहता हूँ
दुनिया में क्या मैं आया हूँ
अपना अस्तीत्व खोने के लिए...
कहीं दूर सूरज को देख के
डरता हूँ डूब जाऊँ मैं भी कहीं ....
वहीँ रास्ता वहीँ मंजील
और फिर अन्धकार वहीँ.
उस की तो है जींदगी वहीँ ..
मुझे वहीँ छोड़ वो आए गा
मैं रह जाऊंगा वहीँ खड़ा ....
कहीं दूर सूरज को देख के
डरता हूँ डूब जाऊँ मैं भी कहीं ....
Subscribe to:
Posts (Atom)
