Thursday, August 24, 2006
फीलिंग 3
आज जब ख़ुद को आइने में देखा
सामने एक अनजाने को पाया,
खुशी के चादर को लपेटे ....
एक रोते चेहरे को पाया
होंठ बरसों से खामोश
आखों को कीसे के इंतज़ार में पाया ...
आज जब ख़ुद को आइने में देखा
सामने एक अनजाने को पाया...
अरमानो के परतों तले
एक रोते चेहरे पाया ...
गौर कीया तो ख़ुद को मैं ने
उस आईने के पीछे पाया ...
अपने ही अनजाने रूप को
आज मैंने अपने सामने पाया ...
आज जब ख़ुद को आइने में देखा
सामने एक अनजाने को पाया ...
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