Wednesday, November 4, 2015

ए चाँद तेरी चाँदनी से, न जाने क्यों मैं डरता हूँ

ए चाँद तेरी चाँदनी से
न जाने क्यों मैं डरता हूँ
भीग कर जिसमे कभी हँसता था
अब सुकून से जलता हूँ

मैं देखता रहा, लोगो बदलते रहे
मैं ने इंतज़ार किया,  मुझे खड़ा छोड़ आगे बढेते  रहे
मुझ से क्यों न बढ़ा गया
उसी मोड़ पे मैं, आज भी अकेला खड़ा सोचता हूँ

मुझ से जब पूछा था किसी ने
चलो बढ़ चलो मेरे साथ, सहारा मैं देता हूँ,
अब, लौटने की उम्मीद में उसके
क्षितिज  पे निगाह टिकाये, आवाज़ में देता हूँ

अजीब मोड़ है अब जिंदगी की
जो गुजारी बस  उम्मीदों में
मिलता नहीं कुछ हिसाब अब
जोड़ घटाव रात भर करता हूँ

ए चाँद तेरी चाँदनी से
न जाने क्यों मैं डरता हूँ
भीग कर जिसमे कभी हँसता था
अब सुकून से जलता हूँ





ए चाँद तेरी चाँदनी से, न जाने क्यों मैं डरता हूँ

Thursday, April 10, 2014

मत रोको मुझे

आने दो अपने पास, मत रोको मुझे
न जाने फिर तुम कब कहाँ मिलो
मतबली दुनिया में हैं रिश्ते बड़े अजीब से
तुम भी न पहचानो  गुजरते वक़्त में शायद
देख गुजरता मुझे अपने करीब से

जो भी है बस यही है
जानना  भी नहीं चाहता
गलत है या फिर सही है
चाहता हूँ बस तुम को देखता हीं रहूँ
ख़ुशी ऐसी महसूस कहीं और होती नहीं है

गुजरते वक़्त में उम्र गुजरती चली  जाएँगी 
चलेंगी साथ कुछ यादें कुछ पीछे छूट जाएँगी
मान कर इतना अब चल चूका हूँ मैं
कहूँगा जब अलविदा इस दुनिया को
कोई साथ हो न हो, यादें जरूर साथ निभाएँगी

Tuesday, April 1, 2014

ढूंढते हैं

कैसी अजीब सी है जिंदगी 
तुम को पता नहीं
तारों के चमक में हम
अब हम तुम्हें ढूंढते हैं

खुद को आईने में देख कर
सोचतें हैं तुम क्या सोचती होगी
हर बार नया कुछ कर के
तुम्हारी नज़र में आने का,  हम बाहाना ढूंढते हैं

कभी यूहीं कभी किसी कारण से
छोटी छोटी बातों से
और रंग बिरंगे फूलों से
तुम को हँसाने का रोज, नया तरीका ढूंढते हैं

रहते हैं दोस्तों के बीच
अजनबी खोए खोए
मगर नज़रें चुरा कर चुपके से
इधर उधर हम बस तुम्हें ढूंढते हैं

अजीब ये हालत है हमारी
छू कर हथेलियों को
लिपट कर अपने बाँहों में
हम तुम्हारी बदन कि गर्मी ढूंढते हैं

सच है मेरे नयन तुम्हें ढूंढते हैं
इधर उधर न जाने क्यों ढूंढते हैं
कुछ न कुछ तो जरुर होगा
हम तो अकेले में,  कारणों  का बस कारण  ढूंढते हैं





Thursday, March 20, 2014

इस हॅसी में ना जाने क्या कुछ ख़ास है


इस हॅसी में ना जाने क्या कुछ ख़ास है
बस चमकति रहती है
चाहता हूँ देखता रहूँ चुपचाप
और पूरी होती रहे दिल में जो हर आस है

समझता हूँ, पर शायद समझना नहीं चाहता 
अनजान बन, सुनहरी यादों को बटोरने में लगा हूँ
बिना  ये पूछे कि तुम क्या चाहती हो 
जानता हूँ, आदत है बुरी पर, मैं बदलना नहीं चाहता 

तुम को बाँहों में ले, समय को थामे बैठा हूँ
कहीं छूट ना जाए एक पल,  रह न जाए कोई बात
यहीं सोच कर मतलबी दुनिया में 
एक मतलबी मैं  भी बना बैठा हूँ

Wednesday, February 26, 2014

अब मै सिर्फ एक वृक्ष हूँ सुखा हुआ


मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
कभी मुझ पर पंछियो का बसेरा था
सुबह शाम के चहचहाट में खुशियाँ थीं
मुझे छोड़ शहर का हर कोना सुना था

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
बरसों पहले आस  भी छूटा
उड़ चुके हैं अब सारे पंछी , घोंसला पूरा खली है
ना जाने क्यों याद नहीं, आंतिम पत्ते से कब रिश्ता टूटा

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
बीते काल ने धीरे धीरे सब हरा
घोंसले का एक एक सुखा तिनका
और जो भी बाकि मुझमें  था हरा

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
थी बसन्त पर मैं था सुखा
प्यार दिखा  अपनों ने ही मुझे तोड़ तोड़
मुझसे अपने घर का चूल्हा फूंका

मै एक वृक्ष हूँ अब सुखा हुआ
मत काटो आज , जड़ों में अभी  प्राण बाकी है
देख कुल्हाड़ी जब मैंने  कहा
तभी आवाज आई  कट दो, अब देने को इस के पास क्या बाकी है

मै एक वृक्ष था सुखा हुआ
किस से कहता , मैं इंसान था, पेड़ मुझे बनाया गया
जब कटा मरा मैं था
पर मुझे चिता बना किसी और को जलाया गया



 

Monday, February 17, 2014

आइना


चाँद ने पेड़  की ओट से
मुझे खिड़की पर खड़ा देखा
और कहने लगा
सर्द अकेली रातों में, खुले पट में
क्या ढूँढ़ते हो

मैंने कहा, चाँद से
वो समय  बीत गया जब
आईने में खुद को देखता था
 अब तो अपना चेहरा भी याद नहीं
बस खिड़की को आइना समझ कर खुद को ढूंढता हूँ

ये सुन  चाँद ने खुद को
बादलों के पीछे किया
और मुझ से हँस  के कहने लगा
देखा है मैंने तुम को उस समय और आज भी
बात सिर्फ इतनी  सी  है, कहो तो मैं बताऊँ 

मैं ने कहा  अब कह भी दो , बरसों बीते बातों बिना
यह सुन चाँद और ज्यादा चमकने लगा
रूकती सासों में हसता हसता कहने लगा
तुम वहीं हो आइना  वहीं है ,बस  उम्र और रिश्तों ने नजरिया बदल दिया
अब आइना खिड़की है बस इस लिए कुछ दीखता नहीं है

Wednesday, January 1, 2014

मन की वेदना

सुनो मेरी मन की वेदना को
अगर समझ सको
बंद कमरे के अन्धेरे कोने में
रखा एक बंद किताब सा
करता रहा हूँ इंतज़ार
कि पड़े नज़र मुझे पर किसी के प्यार की
चाहे मुझे भी कोई, मनहूस  नाकारा समझे बिना

शब्द समय कि मरोभूमि में सुख गए
और अब तो सुन भी नहीं सकता
ले कर अपने बाँहों में
चाहता हूँ बस कोई पढ़े
समझे, मुझसे एक शब्द बोले बिना

सुनो मेरी मन की वेदना को
अगर समझ सको
बंद हूँ बरसों से और
समय ने तुम से पहले मुझे छुआ है
धूल  से दबे मेरे पीले पानों में कुछ जान अभी बाकी है
हाथों का नरम सहारा दे
पलट सको तो पलटना , मेरे पन्ने तोड़े बिना

कुछ देर साथ रहो , मुझे समझो और
समझने दो मुझे मतलब किसी के साथ का
यहीं दबी रह जाएँगी तुम्हारी यादें मेरे पन्नों के बीच
तुम ने जो उठा कर मुझे रख दिया
बदनसीब हूँ , न पढ़ सको तो कोई बात नहीं
पर चले जाना उम्मीद बनने से पहले, और तोड़े  बिना

सुनो मेरी मन की वेदना को
अगर समझ सको, मुझमे अभी कुछ जान बाकि है